कहने को बातें हैं कई जो दिल मैं है दबी कहीं ,
कहना चाहता तो हूँ हर बातें अभी पर जुबान है कहीं।
बातें अपनों की है जो कह न सकता हर किसी से कहीं।.
बस दिल ही दिल मैं गुनगुनाता हूँ बातें खुद से कहीं।.\
अपनों के सितम का आखिर किस्से फरियाद करैं कहीं
न चाहते हुए भी इस दिल से उन्हें कैसे बर्बाद करैं कहीं।.
आलम है रूसबयुं का ऐसा की हर बात है अब दबी कहीं।
बातें बातों मैं ही दब गयी खो गयी न जाने कहीं।.
कहना है हर बात उनसे जिन बातों ने बड़ाई दूरियां कहीं।.
आलम है अब ऐसा की दुश्मन दोस्त हुआ कहीं ...
इज्ज़त का भी ख्याल न रखा उन्हों कहीं।.
खुद को तार तार किया ही मुझे भी रुस्बा किया
यहीं कहीं यहीं कहीं।/.....
कहना चाहता तो हूँ हर बातें अभी पर जुबान है कहीं।
बातें अपनों की है जो कह न सकता हर किसी से कहीं।.
बस दिल ही दिल मैं गुनगुनाता हूँ बातें खुद से कहीं।.\
अपनों के सितम का आखिर किस्से फरियाद करैं कहीं
न चाहते हुए भी इस दिल से उन्हें कैसे बर्बाद करैं कहीं।.
आलम है रूसबयुं का ऐसा की हर बात है अब दबी कहीं।
बातें बातों मैं ही दब गयी खो गयी न जाने कहीं।.
कहना है हर बात उनसे जिन बातों ने बड़ाई दूरियां कहीं।.
आलम है अब ऐसा की दुश्मन दोस्त हुआ कहीं ...
इज्ज़त का भी ख्याल न रखा उन्हों कहीं।.
खुद को तार तार किया ही मुझे भी रुस्बा किया
यहीं कहीं यहीं कहीं।/.....