पूस की रात की अथाह समंदर में हमने रात बिताते देखी है...
इंसानियत को ठंड के थपेड़ों में कहीं सुगबुगाते देखी है...
रात की बात की यूं कट जाए रात...
हर पल में हमने सालों की लंबाई देखी है...
बुझे भट्टीयों पर राख की तपिश में रात गुजारते देखी है...
जानवरों से सिकुड़े इंसानों को भी घुटनों में मुंह छिपाए देखा है...
पूस की रात में हमने इंसानियतो को भी बिछते देखा है
हर जज्बा ऐसा की जज्बे की तपिश से खुद को सहलाते देखा है...
आग की तपिश को भूख की आग में जलते देखा है
रास्ते हैं आसान की उस रास्ते को भी कहीं मुड़ते देखा है
मुड कर करती मंजिल लंबी फिर रात को भी बढ़ते देखा है...
एक दिन फिर से हमने गरीबी की चांद को घटते देखा है
सुख की धूप को निकलते देखा है तो जिंदगी को उस धूप में बढ़ते देखा है..
पूस की ठंड को घटते देखा है तो दिन की तपिश में जिंदगी को बढ़ते देखा है
जानवरों से सिकुड़े इंसानों को भी घुटनों में मुंह छिपाए देखा है...
पूस की रात में हमने इंसानियतो को भी बिछते देखा है
हर जज्बा ऐसा की जज्बे की तपिश से खुद को सहलाते देखा है...
आग की तपिश को भूख की आग में जलते देखा है
रास्ते हैं आसान की उस रास्ते को भी कहीं मुड़ते देखा है
मुड कर करती मंजिल लंबी फिर रात को भी बढ़ते देखा है...
एक दिन फिर से हमने गरीबी की चांद को घटते देखा है
सुख की धूप को निकलते देखा है तो जिंदगी को उस धूप में बढ़ते देखा है..
पूस की ठंड को घटते देखा है तो दिन की तपिश में जिंदगी को बढ़ते देखा है



