खुद से ही अपनी इज्ज़त को तार तार कर दिया...
ये भी न देखा की किन किन को बेजार कर दिया...
दर्द है जो छुपाये छुप नहीं रहा है हर दर्द को कुरेद दिया...
इश्क करने चला था चुपचाप से,पुरे महकमे को बता दिया...
अपने ही आँखों से गीडा अपने दामन को तार तार कर दिया..
बदलने चला था दोस्ती को प्यार में,नफरत में सबकुछ बदल दिया..
किन आँखों से नज़रों को मिलाऊँ नज़रों ने धोका दे दिया...
अपने ही हाथों से अपने प्यार का गला दबा दिया..
न तो अब दोस्ती रही न ही प्यार का मौका दिया..
क्या कहैं किस्से कहीं , कुछ कहने से भी मना कर दिया..
सरे तानेबाने को बुना था उसमें ही उलझा दिया..
खुद से कैसे नजरें मिलाऊँ इसका भी अंदाज़ा न दिया...



