Tuesday, 12 November 2019

कभी हंस भी दिया करो…


कभी हंस भी दिया करो
आज कल यूं बुझी- बुझी रहती हो
बातें कम करती हो, चुप- चुप सी रहती हो
यूं ना अभी से गंभीर बना करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो
कोई नहीं,  काम करना तो अपनी मजबूरी है
पैसा कमाना तो पेट के लिए जरूरी है
जरूरतों को यूं सर पर हावी मत होने दिया करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो
तुम भूल गई जब तुम खिलखिलाकर हंसती थी
तुम्हारे गालों में खुशियों के गढ़ढे बनती थी
क्या हुआ जो दिल टूटा है
कोई नहीं फिर से सजा संवरा करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो
क्या रोना धोना, क्या मुंह लटकाना
जो पूरा ना हो उस अधूरे प्यार को भूल जाया करो
आज एक गया है कोई नहीं कोई दूसरा आ जाएगा
जिंदगी कि अभी शुरुआत हुई है दिल फिर धड़क जाएगा
ऐसे ही दिल को कहीं एक जगह अटकाया मत करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो…


Monday, 11 November 2019

ना जानें क्यों सोमवार आ गई


ना जानें क्यों सोमवार आ गई
रविवार की वो अलसायी सी रात,
उसके ऊपर क्रिकेट का खुमार
रात भर जाम संग दोस्तो की महफील कट गई
ना जानें क्यों फिर से सोमवार आ गई…
अभी तो मैं सोया था, तेरी बाहों में खोया था
अभी तो रात मदहोश हुई थी, संग- संग यूं रंगीन हुई थी
अभी तो इतवार का जोश चढ़ा था, 
तेरे बदन को पूरा- पूरा पढ़ा था
फिर ना जानें क्यों अलार्म बज गई
ना जानें क्यों फिर से सोमवार आ गई
कैसे बीते दिन ये पता ना चला
कब सोमवार, मंगलवार होते शनिवार हो गया
रविवार के जोश में शनिवार से अलसाया था
रविवार का सोच कर शनिवार को मुस्कुराया था
फिर एक दिन रविवार का आया,
साथ में पल भर की खुशियां लाया
खुशियां कब गुबार हो गई
ना जानें क्यों सोमवार आ गई
फिर से वो डेली की झिकझिक
बॉस संग टारगेट की चिकचिक
फिर वही कुऐं से रोज का पानी निकालना
अपने श्रम से किसी को अमीर बनाना
हर पल घुटना, बॉस के आगे सर झुकाना
साल दर साल अपनी तो यही नियती हो गई
अपनी पढ़ाई ना जानें कब गैर की हो गई
ना जानें क्यों सोमवार आ गई…

Wednesday, 28 January 2015

मिलते जुलते बातें करते रहो यारों...

किसी ने क्या खूब कहा है...
बख्शे जाते हैं वो लोग जिनकी किस्मत खराब होती है...
खुदा उन्हें नहीं बख्शता जिनकी नीयत खराब होती है...
न मेरा एक होगा... न तेरा लाख होगा...
न तारिफ तेरी होगी... न मजाक मेरा होगा...
गुरूर न कर शाहे शरीर का,
मेरा भी खाक होगा, तेरा भी खाक होगा...
जिंदगी भर ब्रांडेड ब्रांडेड करने वालों...
याद रखना कफन का कोई ब्रांड नहीं होता...
कोई रो कर दिल बहलाता है, कोई हंस कर दर्द छिपाता है
क्या करामात है कुदरत का यारों, जिंदा इंसान पानी में डूब जाता है..
और मुर्दा तैर कर दिखाता है....
मौत को देखा तो नहीं शायद वो बहुत खूबसूरत होगी...
कमबख्त जो भी उससे मिलता है जीना छोड़ देता है...
गजब की एकता देखी लोगों की जमाने में...
जिंदों को गिराने में और मुर्दों को उठाने में...
जिंदगी में न जाने कौन सी बात आखिरी होगी...
न जाने कौन सी रात आखिरी होगी...
मिलते जुलते बातें करते रहो यारों

एक दूसरे से न जाने कौन सी मुलाकात आखिरी होगी...

Friday, 9 January 2015

मेरी तस्वीर को सीने से लगाता क्यूँ है

मेरी तस्वीर को सीने से लगाता क्यूँ है

मुझसे ना मिलने की कसम खाता क्यूँ है ?
मेरी तस्वीर को सीने से लगाता क्यूँ है ?
अनदिखा सा रहता है क्यूँ मुझको यारब
और लोगों से मिरा दीदार कराता क्यूँ है ?
वक्त मरहम है,दिल को तसल्ली देता है,गर
तो फ़िर वो हमें खंजर चुभाता क्यूँ है ?
दिल को मेरे भी जरा तपिश तो ले लेने दे
साए से मेरे धुप चुरा कर ले जाता क्यूँ है ?
हश्र तक भी जो पूरे ना हों ऐसे मिरे यारब
सपने हम सबको दिखाता है,दिखाता क्यूँ है ?
तेरे चक्कर में घनचक्कर हुआ हूँ मैं "गाफिल"
मेरी मर्ज़ी के खिलाफ मुझे चलाता क्यूँ है ?
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एक बात तो बता अ दोस्त......
तुझे प्यार करना अच्छा लगता है......
या नफरत करना..........??
धत्त.......
ये भी भला कोई पूछने की बात है.....
प्यार करना.....और क्या....!!
क्यूँ....अ मेरे दोस्त ??
क्यूंकि प्यार से ही दुनिया....
दुनिया बनी हुई रहती है.....!!
बस मेरे दोस्त.....
मुझे तुझसे यही पूछना था....!!

Saturday, 20 December 2014

पूस की रात...



पूस की रात की अथाह समंदर में हमने रात बिताते देखी है...

इंसानियत को ठंड के थपेड़ों में कहीं सुगबुगाते देखी है...

रात की बात की यूं कट जाए रात...
हर पल में हमने सालों की लंबाई देखी है...


बुझे भट्टीयों पर राख की तपिश में रात गुजारते देखी है...

जानवरों से सिकुड़े इंसानों को भी घुटनों में मुंह छिपाए देखा है...

पूस की रात में हमने इंसानियतो को भी बिछते देखा है

हर जज्बा ऐसा की जज्बे की तपिश से खुद को सहलाते देखा है...

आग की तपिश को भूख की आग में जलते देखा है

रास्ते हैं आसान की उस रास्ते को भी कहीं मुड़ते देखा है

मुड कर करती मंजिल लंबी फिर रात को भी बढ़ते देखा है...

एक दिन फिर से हमने गरीबी की चांद को घटते देखा है

सुख की धूप को निकलते देखा है तो जिंदगी को उस धूप में बढ़ते देखा है..

पूस की ठंड को घटते देखा है तो दिन की तपिश में जिंदगी को बढ़ते देखा है



Thursday, 18 December 2014

इंसाफ किसे मिल रहा है...




कहां हैं हम और किसे इंसाफ दिला रहे हैं एक बड़ा सवाल है क्योंकि जिस न्यायपालिक में लाखों केस आए दिन बस यूं ही धूल फांकते रहते हैं और अर्दली पैसे लेकर डेट बढ़ाते रहते हैं तो उस देश में इंसाफ कि मियाद पर मुनादी तो बार बार की जा सकती है लेकिन फैसले के लिए दिन को कितनी मोहलत चाहिए ये एक बड़ा सवाल है... ललित नारायण मिश्रा को मरे करीब चार दशक बीत गए लेकिन इंसाफ की देवी के मुख से इंसाफ अब जा कर निकला है वो भी जिस रूप में निकला है वो बताता है कि इंसाफ की आंख पर सच में पट्टी बंधी है क्यों कि ये पट्टी ये नहीं बताती कि न्याय निसपक्ष किया जा रहा है बल्कि ये बताती है कि जिस देश में उसे न्याय के लिए खड़ा किया गया है वहां वक्त कि किसी परवाह है हर एक के पास वक्त ही वक्त है... और न्याय के लिए समय ही समय... सोचिए जरा जिस ललित नारायण मिश्र की मौत के बाद जिस बेटे ने केस लड़ा अब उसका बेटा भी जवानी की दहलीज पार कर रहा है यानि दादा के मौत की सजा उसके पोते के सामने सुनाई जा रही है तो ऐसे में सवाल अभी भी यही है कि जरा सोचिए कि हम किस ओर जा रहे हैं और इंसाफ किसे मिल रहा है या नाइंसाफी किससे साथ है... जरा सोचिएगा...   

बस मां ही सत्य होगी..

जो सच है वो आज है
जो झूठ है वो कल है
हर फितरत में कुछ बात है
हर मुस्कान में कुछ राज है...
सिर्फ एक चीज है जो निस्वार्थ है
वो बस मां है, मां है, मां है
जिसकी हर बात भी सच है
जिसकी हर कल भी सच है
जिसका कल भी सच होगा
न उस मां का कोई विकल्प होगा
न उस ममता का कोई विकल्प होगा
बस सच में सिर्फ मां होगी...
निस्वार्थ निस्कपट उसकी ममता होगी

बस मां ही सत्य होगी... सिर्फ मां ही सत्य होगी