ना जानें क्यों सोमवार आ गई
रविवार की वो अलसायी सी रात,
उसके ऊपर क्रिकेट का खुमार
रात भर जाम संग दोस्तो की महफील कट गई
ना जानें क्यों फिर से सोमवार आ गई…
अभी तो मैं सोया था, तेरी बाहों में खोया था
अभी तो रात मदहोश हुई थी, संग- संग यूं रंगीन हुई थी
अभी तो इतवार का जोश चढ़ा था,
तेरे बदन को पूरा- पूरा पढ़ा था
फिर ना जानें क्यों अलार्म बज गई
ना जानें क्यों फिर से सोमवार आ गई
कब सोमवार, मंगलवार होते शनिवार हो गया
रविवार के जोश में शनिवार से अलसाया था
रविवार का सोच कर शनिवार को मुस्कुराया था
फिर एक दिन रविवार का आया,
साथ में पल भर की खुशियां लाया
खुशियां कब गुबार हो गई
ना जानें क्यों सोमवार आ गई
फिर से वो डेली की झिकझिक
बॉस संग टारगेट की चिकचिक
फिर वही कुऐं से रोज का पानी निकालना
अपने श्रम से किसी को अमीर बनाना
हर पल घुटना, बॉस के आगे सर झुकाना
साल दर साल अपनी तो यही नियती हो गई
अपनी पढ़ाई ना जानें कब गैर की हो गई
ना जानें क्यों सोमवार आ गई…

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