कभी हंस भी दिया करो…
आज कल यूं बुझी- बुझी रहती हो
बातें कम करती हो, चुप- चुप सी रहती हो
यूं ना अभी से गंभीर बना करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो
कोई नहीं, काम करना तो अपनी मजबूरी है
पैसा कमाना तो पेट के लिए जरूरी है
जरूरतों को यूं सर पर हावी मत होने दिया करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो
तुम भूल गई जब तुम खिलखिलाकर हंसती थी
तुम्हारे गालों में खुशियों के गढ़ढे बनती थी
क्या हुआ जो दिल टूटा है
कोई नहीं फिर से सजा संवरा करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो
क्या रोना धोना, क्या मुंह लटकाना
जो पूरा ना हो उस अधूरे प्यार को भूल जाया करो
आज एक गया है कोई नहीं कोई दूसरा आ जाएगा
जिंदगी कि अभी शुरुआत हुई है दिल फिर धड़क जाएगा
ऐसे ही दिल को कहीं एक जगह अटकाया मत करो
अरे यार कभी हंस भी दिया करो…

