कहां हैं हम और किसे
इंसाफ दिला रहे हैं एक बड़ा सवाल है क्योंकि जिस न्यायपालिक में लाखों केस आए दिन
बस यूं ही धूल फांकते रहते हैं और अर्दली पैसे लेकर डेट बढ़ाते रहते हैं तो उस देश
में इंसाफ कि मियाद पर मुनादी तो बार बार की जा सकती है लेकिन फैसले के लिए दिन को
कितनी मोहलत चाहिए ये एक बड़ा सवाल है... ललित नारायण मिश्रा को मरे करीब चार दशक
बीत गए लेकिन इंसाफ की देवी के मुख से इंसाफ अब जा कर निकला है वो भी जिस रूप में
निकला है वो बताता है कि इंसाफ की आंख पर सच में पट्टी बंधी है क्यों कि ये पट्टी
ये नहीं बताती कि न्याय निसपक्ष किया जा रहा है बल्कि ये बताती है कि जिस देश में
उसे न्याय के लिए खड़ा किया गया है वहां वक्त कि किसी परवाह है हर एक के पास वक्त
ही वक्त है... और न्याय के लिए समय ही समय... सोचिए जरा जिस ललित नारायण मिश्र की मौत
के बाद जिस बेटे ने केस लड़ा अब उसका बेटा भी जवानी की दहलीज पार कर रहा है यानि
दादा के मौत की सजा उसके पोते के सामने सुनाई जा रही है तो ऐसे में सवाल अभी भी
यही है कि जरा सोचिए कि हम किस ओर जा रहे हैं और इंसाफ किसे मिल रहा है या
नाइंसाफी किससे साथ है... जरा सोचिएगा...


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