आज फिर उनसे बात हुई,
न जाने क्यूँ उनसे बात हुई..
कुछ पलों की बात में
बस जज्बात थम सी गयी..
वीराने मैं फिर उथल पुथल सी हुई..
वक़्त जो कहीं थमा था फिर से चल पड़ी..
बहुत कुछ कहना था उनसे
फिर भी कुछ बात न हुई..
आवाज़ सुन कर दिल धक् सा गया
जज़्बात कहीं गाफूर हूई...
एक सकूँ सा दिल को मिला
लेकिन हिम्मत फिर भी हार गयी...
मुझे पता है की मैं उसके लायक नहीं..
फिर भी दिल के हाथों मजबूर हुआ..
कर दिया अपने दिल को तार तार ..
अपने ही वादों को तोड़ दिया..
बस एक बार बात करने की चाह मैं
अपने ही जखम कुरेद गया...
कैसे समझाओं इस दिल को जो
अब भी उसे ही कहीं दुन्धता है..
ना चाह कर भी भीड़ मैं उसे ही सोचता है..
अब फिर से दिल ने ली है कसम...
ना होगी अब बात उनसे कहीं...
अपने दिल को और न करूँगा तार तार....
हिम्मत रखूँगा और करूँगा बस खुद से प्यार...
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