Wednesday, 11 July 2012

हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता

कभी-कभी ऐसा भी होता है
हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता.....!!
और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम....
खीजते हैं,परेशान होते हैं...
चारों तरफ़ अपनी अक्ल दौडाते हैंमगर रास्ता है कि नहीं ही मिलता....
अपने अनुभव के घोडे को हम....
चारों दिशाओं में दौडाते हैं......
कितनी ही तेज़ रफ़्तार से ये घोडे
हम तक लौट-लौट आते हैं वापस
बिना कोई मंजिल पाये हुए.....!!
रास्ता है कि नहीं मिलता......!!
हमारी सोच ही कहीं गूम हो जाती है......
रास्तों के बेनाम चौराहों में.....
ऐसे चौराहों पर अक्सर रास्ते भी
अनगिनत हो जाया करते हैं..........
और जिंदगी एक अंतहीन इम्तेहान.....!!!
अगर इसे एक कविता ना समझो
तो एक बात बताऊँ दोस्त.....??
रास्ता तो हर जगह ही होता है.....
अपनी सही जगह पर ही होता है.....
बस.....
हमें नज़र ही नहीं आता......!!!! 

तकलीफ में जीना बहुत मुश्किल होता है, होता है ना ?

तकलीफ में जीना बहुत मुश्किल होता है,
होता है ना ?
और जब हम यह जानते हों कि
इस तकलीफ को हम शायद मिटा भी नहीं सकते
तब ??
अपने निजी जीवन की तकलीफों को तो
अक्सर मिटा ही लेते हैं हम
कभी आसानी से तो कभी कठिनाईयों से
मगर अपने आस-पास और दूर की तकलीफों का क्या करें
जिनके बारे में रोज पढते हैं और देखते हैं !
हमारे ही आसपास बहुत सारे लुटेरे रहते हैं
जो तरह-तरह से हमारे वतन को लूटते हैं
और बेरहम हैं वो इतने कि
खुद के पकडे जाने के भय से
किसी की ह्त्या भी कर देते हैं,या करवा देते हैं !!
हमारे आस-पास हमारे राज्य या देश का लूटा जाना
कोई कुछ पैसों-भर का खेल नहीं है दोस्तों
यह खेल है करोडों का,अरबों का,खरबों का
मगर यह खेल कुल इतना भर भी नहीं दोस्तों
यह प्रश्न का वतन की आबरू का
इसके माथे का शर्म से झुक जाने का
और उसके बावजूद भी हमारे सत्तानशीनों की बेहयाई का
और अपनी तमाम करतूतों के बावजूद के जा रही थेथरई का !!
ऐसा क्यूँ है दोस्तों कि हमारे वतन में जो भी,जहां भी
सत्ता में है,मद में चूर है
और मादरे-वतन की इज्ज़त का उसे कुछ होश ही नहीं है !!
ऐसा क्यूँ है दोस्तों कि यहाँ हर ताकतवर
कमजोरों पर जुल्म-ही-जुल्म ढाने को तत्पर है
और किसी भी मानवीयता का उसमें लेश मात्र भी नहीं है.....
इस तकलीफ के साथ जीना मुश्किल ही नहीं,असंभव है दोस्तों
और अपनी या हम सबकी इस तकलीफ का क्या करना है
आईये हम सब मिलकर सोचते हैं
और सोचकर कुछ कर गुजरते हैं क्योंकि
तकलीफ में जीना बहुत मुश्किल होता है,
होता है ना ?

Sunday, 8 July 2012

एक बात तो बता अ दोस्त......

मुझसे ना मिलने की कसम खाता क्यूँ है ?
मेरी तस्वीर को सीने से लगाता क्यूँ है ?
अनदिखा सा रहता है क्यूँ मुझको यारब
और लोगों से मिरा दीदार कराता क्यूँ है ?
वक्त मरहम है,दिल को तसल्ली देता है,गर
तो फ़िर वो हमें खंजर चुभाता क्यूँ है ?
दिल को मेरे भी जरा तपिश तो ले लेने दे
साए से मेरे धुप चुरा कर ले जाता क्यूँ है ?
हश्र तक भी जो पूरे ना हों ऐसे मिरे यारब
सपने हम सबको दिखाता है,दिखाता क्यूँ है ?
तेरे चक्कर में घनचक्कर हुआ हूँ मैं
मेरी मर्ज़ी के खिलाफ मुझे चलाता क्यूँ है ?
०००००००००००००००००००००००००००००००००००
०००००००००००००००००००००००००००००००००००
एक बात तो बता अ दोस्त......
तुझे प्यार करना अच्छा लगता है......
या नफरत करना..........??
धत्त.......
ये भी भला कोई पूछने की बात है.....
प्यार करना.....और क्या....!!
क्यूँ....अ मेरे दोस्त ??
क्यूंकि प्यार से ही दुनिया....
दुनिया बनी हुई रहती है.....!!
हुम्म्म्म्म्म्म्म
बस मेरे दोस्त.....
मुझे तुझसे यही पूछना था....!!

Thursday, 7 June 2012

सितम

 कहने  को  बातें  हैं  कई जो दिल मैं है दबी कहीं ,
कहना चाहता तो हूँ हर बातें अभी पर जुबान है  कहीं।
बातें अपनों की है जो कह न सकता हर किसी से कहीं।.
बस  दिल ही दिल मैं गुनगुनाता हूँ बातें खुद से कहीं।.\
अपनों के सितम का आखिर किस्से फरियाद करैं कहीं
न चाहते हुए  भी इस दिल से उन्हें कैसे बर्बाद करैं कहीं।.
आलम  है रूसबयुं का ऐसा की हर  बात है अब दबी  कहीं।
बातें बातों मैं ही दब गयी  खो गयी न जाने कहीं।.
कहना है हर बात उनसे जिन बातों ने  बड़ाई  दूरियां कहीं।.
आलम है अब ऐसा की दुश्मन दोस्त हुआ कहीं ...
इज्ज़त का भी ख्याल न रखा उन्हों कहीं।.
खुद को तार तार किया ही मुझे भी रुस्बा किया
यहीं कहीं यहीं कहीं।/.....

  

Monday, 21 May 2012

महफ़िल



तेरे मैं  के अर्थों में मुझे खो जाने दे...
इक ज़रा मुझ को खुद में ही खो जाने दे!!सामने बैठा भी नज़र ना आए तू मुझेऐसी बात है तो मुझको ही चला जाने दे !!
तेरी मर्ज़ी से आया तो हूँ अय मेरे खुदा 
अपनी मर्ज़ी से मुझे जीने दे,चला जाने दे!!

आँख ही आँख से बातें दे करने दे तू मुझेसाँस को साँस से जुड़ने दे उसे समाने दे!!
इक जरा जोर से दिल को मेरे  धड़कने तो दे 
इक
 जरा जोर से मुझे आज तू खिलखिलाने दे !!
मुझको मेरी ही कीमत ही नहीं पता ये खुदा 
इक तिरे सामने मुझे महफ़िल अपनी जमाने दे!!

Friday, 18 May 2012

न जाने क्यूँ

आज  फिर से वो मुझे अच्छी ल गी ...
 न   जाने क्यूँ अच्छी लगी।.
दिल    ने फिर से ताने बाने बुने 
और वो मुझे  अच्छी ल गी.. 
उसकी आँखों मैं फिर से दिल   खोने लगा ....
साडी रुस्बयिओं को भूल  फिर से प्यार करने लगा।..
उनकी आँखों मैं फिर से खो जाना चाहता हूँ।..
खुद से नहीं अब उनसे प्यार करना चाहता हूँ।..
बेईज्ज़ती के उस  पल को छोड़ कहीं आगे बढ़ना चाहता हूँ।.
उनकी बाँहों मैं अपने सर को रख  आँखे बंद करना चाहता हूँ।.
प्यार है उनसे बहुत उन्हें भी बताना चाहता हूँ।..
खुद से ज्यादा मुझ  पर  बिश्वास  करे ये जाताना चाहता हूँ।.
उसको कोई दुख न हो ये बताना चाहता हूँ।..
बस  उसको और   सिर्फ  उसको  प्यार करना चाहता हूँ।..

Saturday, 28 April 2012

खुद से ही अपनी इज्ज़त को तार तार कर दिया...
ये भी न देखा की किन किन को बेजार कर दिया...
दर्द है जो छुपाये छुप नहीं रहा है हर दर्द को कुरेद दिया...
इश्क करने चला था चुपचाप  से,पुरे महकमे को बता दिया...
रंग ऐसा उतरा  है इश्क का, की हर रंग काला कर दिया..
अपने ही आँखों से गीडा अपने दामन  को तार तार कर दिया..
बदलने चला था दोस्ती को प्यार में,नफरत में सबकुछ बदल दिया..
किन आँखों से नज़रों को मिलाऊँ नज़रों ने धोका दे दिया...
अपने ही हाथों से अपने प्यार का गला दबा दिया..
न तो अब  दोस्ती रही न ही प्यार का मौका  दिया..
क्या कहैं किस्से कहीं , कुछ कहने से भी मना कर दिया..
सरे तानेबाने को बुना था उसमें ही उलझा दिया..
खुद से कैसे नजरें मिलाऊँ  इसका भी अंदाज़ा न दिया...