कहां हैं हम और किसे
इंसाफ दिला रहे हैं एक बड़ा सवाल है क्योंकि जिस न्यायपालिक में लाखों केस आए दिन
बस यूं ही धूल फांकते रहते हैं और अर्दली पैसे लेकर डेट बढ़ाते रहते हैं तो उस देश
में इंसाफ कि मियाद पर मुनादी तो बार बार की जा सकती है लेकिन फैसले के लिए दिन को
कितनी मोहलत चाहिए ये एक बड़ा सवाल है... ललित नारायण मिश्रा को मरे करीब चार दशक
बीत गए लेकिन इंसाफ की देवी के मुख से इंसाफ अब जा कर निकला है वो भी जिस रूप में
निकला है वो बताता है कि इंसाफ की आंख पर सच में पट्टी बंधी है क्यों कि ये पट्टी
ये नहीं बताती कि न्याय निसपक्ष किया जा रहा है बल्कि ये बताती है कि जिस देश में
उसे न्याय के लिए खड़ा किया गया है वहां वक्त कि किसी परवाह है हर एक के पास वक्त
ही वक्त है... और न्याय के लिए समय ही समय... सोचिए जरा जिस ललित नारायण मिश्र की मौत
के बाद जिस बेटे ने केस लड़ा अब उसका बेटा भी जवानी की दहलीज पार कर रहा है यानि
दादा के मौत की सजा उसके पोते के सामने सुनाई जा रही है तो ऐसे में सवाल अभी भी
यही है कि जरा सोचिए कि हम किस ओर जा रहे हैं और इंसाफ किसे मिल रहा है या
नाइंसाफी किससे साथ है... जरा सोचिएगा...
Thursday, 18 December 2014
बस मां ही सत्य होगी..
जो झूठ है वो कल है
हर फितरत में कुछ बात है
हर मुस्कान में कुछ राज है...
सिर्फ एक चीज है जो निस्वार्थ है
वो बस मां है, मां है, मां है
जिसकी हर बात भी सच है
जिसकी हर कल भी सच है
जिसका कल भी सच होगा
न उस मां का कोई विकल्प होगा
न उस ममता का कोई विकल्प होगा
बस सच में सिर्फ मां होगी...
निस्वार्थ निस्कपट उसकी ममता होगी
बस मां ही सत्य होगी... सिर्फ मां ही सत्य होगी
Wednesday, 17 December 2014
ख़ून के नापाक ये धब्बे
ख़ून
के नापाक ये धब्बे, ख़ुदा से कैसे छिपाओगे,
मासूमों
की क़ब्र पर चढ़कर, कौन सी जन्नत में जाओगे'
मैं
मासूम हर दिन की तरह स्कूल जा रहा था... स्कूल यूनिफार्म, जूते और बैग लेकर
मंगलवार की सुबह स्कूल के लिए निकला था... हर दिन की तरह मुझे मां ने विदाई दी
थी... तो पापा ने मुस्कुरा कर संभल कर जाने को कहा था.... मैं पाकिस्तान का
मुस्तकबिल था... मैं मासूम पाकिस्तान के पेशावर का दिल था... मैं हंसता था तो
पेशावर भी हंसता था... मैं रूठा तो पेशावर भी रूठा... लेकिन मंगलवार की सुबह न
जाने कौन सा अमंगल मैं कर आया कि जिस सर को फक्र से क्लास में उठाकर मैडम की सिखाई
चीजें बोलनी थी उस सर को मैं कहीं छुपा कर आतंकियों से अपनी जिंदगी की भीख मांग
रहा था...मैं मासूम हर दिन की तरह
छुट्टी की घंटी की आवाज सुनने के लिए बार बार बाहर देख रहा था... लेकिन गोलियों की
आवाज से हमें हर बार अमंगल होने की बात बताई... मैं आजाद पाकिस्तान की तीसरी पीढ़ी हूं और जो बर्बरता आतंकियों का
मैंने देख लिया मुझे नहीं लगता इससे ज्यादा बेरहम चेहरा किसी आतंक का होगा... मैं
मासूम तहरीक-ए-तालिबान से पूछना चाहता हूं कि हम भी तो आपके बच्चे जैसे ही थे...
हमारे रगों में भी आपके ही भाईयों का खून दौर रहा था... ऐसे में जिस खून को
फजरुल्ला के कहने पर आप ने बहाया फसका रंग भी लाल था... मैं हरी वर्दी पहन कर
पाकिस्तान की आवोहवा में खुद के हरियाली होने की दिशा बता रहा था मेरे उस वर्दी को
आप आतंकियो ने लाल कर दिया... मैं हर बाप का सपना था तो हर मां की लोरी...
मेरी सब्ज़ वर्दी को
सुर्ख़ किसने किया ,हरे रंग पर लाल लहू अब चढ़ गया... मैं तो भविष्य बनने जा रहा था लेकिन
जगह कॉफीन से होते हुए कब्र में मिली... मेरे बाप ने मेरे जनाजे को कांधा दिया तो
मेरी मां अंतिम विदाई में लोरी भी नहीं सुना पाई क्यों कि उसे तो होश नहीं वो तो
अब भी इंतजार कर रही है कि मैं स्कूल से हंसता हुआ आउंगा और उससे लिपट कर
मुस्कुराऊंगा...मुझ मासूम को अपने माता पिता का मुस्तकबिल बन चमकना था लेकिन मैं दहशतगर्दी
के साए से ऐसा लिपटा की कब्र की स्याह अंधेरे
में सो गया... सवाल मेरा अभी भी उस अंधेरे से है...
तुम्हारी
कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो
झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी
कब्र में मैं दफन, तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी
फुरसत मिले तो फातेहा पढनें चले आना
Saturday, 10 August 2013
आशियाना बदल लिया
आसमान के परिंदो ने
भी अपना आशियाना बदल लिया
अनवरत सी बहती पानी
ने किनारा बदल लिया...
दुशमन भी अब करते
हैं छुप कर घुसपैठ
बंदुकों नें भी अपना
निशाना बदल लिया
दुशमनों का भीर में
छुपा रहनुमा कौन है..
दोस्तों ने भी
दोस्ती का पैमाना बदल लिया..
छत पर आती थी धुप
खिलकर कभी...
अब तो रौशनी ने भी अपना
किनारा बदल लिया...
चॉंद जो छत पर आ
शीतल कर जाती थी...
पता नहीं क्यों उसने
तासीर बदल ली...
क्या गलती है मेरी
कोई मुझे भी कह जाये
मेरे दोस्तों ने
मुझसे दोस्ती बदल लीया...
Friday, 2 August 2013
देश को खतरा किस से है
देश को खतरा किस से है
चीन, अमेरिका या पाकिस्तान से
दोस्ती किस से है
ब्रिटेन, ईरान या अफगानिस्तान से
जब देखते है तो लगता है
अब कहीं से कोई खतरा नहीं है
अपने ही देश में पलत्ती गरीबी, बेबसी
और भ्रष्टाचार से
जलती आग
कर सकती है सब सुछ राख
सुना था कि भूख इन्सान को शैतान बनाती है
पर यहां तो खाते-पीते लोग
राक्षस बन रहे हैं
रोटी को लूटना अपराध है
पर लुटेरों के घर सोने की
ईंटों से सज रहे हैं
क्या भूखे पेट में शैतान बसेगा
उसके लिए तो अब महल बन गये हैं
चीन, अमेरिका या पाकिस्तान से
दोस्ती किस से है
ब्रिटेन, ईरान या अफगानिस्तान से
जब देखते है तो लगता है
अब कहीं से कोई खतरा नहीं है
अपने ही देश में पलत्ती गरीबी, बेबसी
और भ्रष्टाचार से
जलती आग
कर सकती है सब सुछ राख
सुना था कि भूख इन्सान को शैतान बनाती है
पर यहां तो खाते-पीते लोग
राक्षस बन रहे हैं
रोटी को लूटना अपराध है
पर लुटेरों के घर सोने की
ईंटों से सज रहे हैं
क्या भूखे पेट में शैतान बसेगा
उसके लिए तो अब महल बन गये हैं
Wednesday, 31 July 2013
Saturday, 4 August 2012
जो तेरा है वो तेरा तो नहीं है.......!!!!
जो तेरा है वो तेरा तो नहीं है,
जो मेरा है वो मेरा तो नहीं है !
जो जितना अच्छा दिखता है
देखो,वो उतना भला तो नहीं है!
ठीक है,वो चारागर होगा मगर
बस इतने से वो खुदा तो नहीं है !
नजदीक से देखने से लगता है,
कहीं वो मुझसे जुदा तो नहीं है !
रह-रह कर कुछ टीसता-सा है ,
कहीं मुझको कुछ हुआ तो नहीं है !
कुछ जो भी यहाँ पर गहरा-सा है,
कभी हर्फों में वो बयाँ तो नहीं है !
हर जगह वो मुझसे छुपता है
कहीं वो मेरा राजदां तो नहीं है !
हर पल बस तेरा नाम लेता हूँ,
ओ मेरे खुदा रे कहाँ तू नहीं है !
हर हद तक जाकर तुझको खोजा
कहीं तू मेरे दरमियाँ तो नहीं है !
हर्फों का शोर ये समझ ना आये
कहीं तू हर्फों में ही निहां तो नहीं है !!
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