Wednesday, 14 March 2012

मैं

आज हर कोई बस अपने  "मैं " में कहीं खो सा गया है..
सब के साथ होते हुए भी गुमशुम सा खो गया है..
 जिन्दगी की भागदौड़ में भूल गया है हम को कहीं..
बस मैं और मैं में जी रहा है, भूल सा गया है सबकुछ कहीं   ...
 पैसे और रुतबे के आगे बस अब "मैं"  ही जिन्दा है ....
मांगता है जिन्दगी से भीख तूं बस पैसे की..
खुद के ही आगे बस बरबस सा जिन्दा है तू कहीं ....
अंधे दौड़ मैं ऐ बन्दे तूं चाहता क्या है अब ..
दिल से सोच जरा तूं खुद से मांगता क्या है अब..
अपने "मैं" में ही तूं कहीं खो सा गया है अब..
 सब की भीड़ में गुम हो गया है अब..
ऐ बन्दे सुन मेरी बात सारा गौर से तूं..
छोड़ दे "मैं" की चाहत और पा ले "हम" को तूं..
 मिल जाएगी खुशियाँ साडी , खुद को भी पा लेगा तूं..
हर मंजिल जाएगी फिर तुमसे जुड़ कर ..
तूं फिर हो जायेगा "मैं" से हम फिर..
 कर ले प्यार इस जहाँ के हर बन्दे से..
हर बंदा है यहाँ अपना, तूं खो जा इनमे तू.. 

Tuesday, 13 March 2012

Dosti....


दोस्तों की महफ़िल के रंग जमे बड़े दिनों के बाद 
हर दोस्त याद आया है अब बड़े दिनों के बाद .....
कुछ के चेहरों को वक़्त ने तो कुछ  ने वक़्त को घेर रखा है..
हर कोई है जिम्मेदार कुछ ज्यादा शायद, 
जिम्मेदारी से सबका नाता है  .....
क्लास मैं टाइम पर आने पर भी पीछे बैठने की जीद होती थी....
 तो कहीं दोसरों की कॉपी से उतारने की होड़ होती थी.....
 हर बात थी उस वक़्त निराली, 
हर मोड़ था निराला......
 बिना किसी भेद भाव के दोस्ती थी कहीं.....
जो न दिखती है अब कहीं ...
 भेद भी अब हैं वो भी भाव के साथ.....
 दोस्ती अब भी है लेकिन हावभाव के साथ....
 वक़्त की आंधी मैं खुद को ढाल आये हैं हम ......
अब हमें काम रूपी आंधी हिलाती रहती है हर वक़्त.....
बस जम गए हैं हमारे पांव अपने ही जिमेदारिओं में कहीं.....
चेहरे पर गंभीरता ने ले ली है जगह हर कहीं........
बस दोस्ती रूपी ईमानदारी अभी भी जिन्दा है
 हमारे अन्दर कहीं....
और यादें बसी  हैं ईमानदारी से हमारे दिलों में कहीं......
जो मिलाती है हमें बस यहीं कहीं यहीं कहीं.........

Friday, 9 March 2012

मेरी माँ

 माँ ममता की तिजोरी है..
हर दुःख में साथ में कहीं खड़ी है..
न कोई उम्मीद मुझसे न कोई तमन्ना है..
बस हर हाल मैं खुश देखना है मुझे.....
बचपन मैं ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया.
हर हिचकियों पर  पीठ भी थपथपाई.
मेरी हर धरकन को खुद मैं समेटा..
और साथ में चलना सिखाया..
जिन्दगी की मझधार में पतवार बनती है माँ..
पूरी उम्र बस आपके लम्बी उम्र की कामना करती है माँ..
आपके आंशुओं को कभी भी देख न पाती है माँ...
बस हर पल आपकी ख़ुशी ....
और बस आपकी ख़ुशी देखना चाहती है माँ..
बचपन में बस्तों का बोझ न पड़े.....
कन्धों पर खुद बैग उताठी है माँ...
हर शाम में अपनी नींद को छोड़...

अपने बच्चों को सुलाती है माँ...
मैंने  कभी भी अपने माँ को सोते हुए नहीं देखा..
न ही कभी बैठे हुए देखा...
हर पल में उसे बस अपनों के लिए जीते देखा है...
पूरी उम्र बस आँखों में रंगीन  सपनों को पलते देखा है..
 लकिन हम अभागे बच्चे उसी माँ को छोड़ कहीं और बसते हैं..
और  माँ के दिल को हर वक़्त दुखाते है...
रुलाते हैं उसे किसी और की ख़ुशी के लिए..
फिर भी माँ न कुछ कहती है....
 हर पल अपने बच्चे की ख़ुशी के लिए जीती है..
जब आँखे भी बंद करती है माँ....
फिर भी एक ही सपना पालती  होगी माँ..
अपनी अंतिम यात्रा पर भी........
अपने बच्चों को बस खुश देखना चाहती है माँ..




Tuesday, 6 March 2012

रंगों का त्यौहार है होली, 
गालों पर रंग ने कुछ प्यार से बोली
हर रंग की एक अलग सी भाषा हर रंग की एक अलग सी बोली..
जब हाथों ने रंगों से की हमजोली तो रंग भी कुछ लाल  हो बोली..
मल  दे इन हाथों को किसी गोरी के गालों पर ..
जहाँ वो भी रंग जाये और उसका मन भी..
लेकिन   में हूँ थोड़ा अलग और मेरी होली भी है अलग..
खेलूँगा  में उनके साथ जिसने न देखा हो रंग कभी..
हर रंग एक एक कर लगाऊंगा उन्हें..
डूबा दूंगा उनको  पूरा पूरा कहीं..
जिस काले रंग को बना लिया है जीवन उन्होंने ,
रंग दूंगा हर रंग से उन्हें..
लाल , नीले, ब्लू, पीले, केशरिया से रंग दूंगा उन्हें..
हर रंग उन्हें समझाऊंगा ...दुनिया की रंग बिरंगी तश्वीर दिखाऊंगा..
रंग दूंगा उनके मन को सतरंगी घटा से कहीं 
जो बरसे उनपर बस उनपर कहीं..
दिखाऊंगा अपने आँखों से हर रंग , 
मनाऊंगा मैं होली इसबार इन अंधे बच्चों के संग..

Monday, 5 March 2012

सादगी

रोज देखता हूँ उसे चुपचाप खड़ी ,
भीड़ से कहीं अलग गम सुम सी खड़ी  ,
चहेरे पर एक अजब सी सादगी,
मैं देखता हूँ उसे हर दिन और वो भी मुझे बस खड़ी खड़ी ..
लकिन कहता न कुछ बस दोनों गम सुम से खड़े...
उसका  पलक छपकना कुछ छुपाता है कहीं ..
लकिन सादगी उसे करती है औरों से अलग कहीं..
रोज देखने उसे आता हूँ जल्दी उसी जगह पर कहीं ..
बस उसकी सादगी को जो उसने ओढ़ रखी है अपने ऊपर कहीं ..
आँखों में बसा रखी है. सुन्दरता जो है अलग कहीं ...
एक अलग सी है वो बिलकुल अलग..
सादे कपड़ों में वो है रंगीन कहीं..
मुझे पसंद है उसकी मुस्कुराहट 
जो वो बस हौले से मुस्कुराती है..
शायद कुछ सोच कर किसी बात परकहीं  ..
लकिन वो है बस अलग, चुपचाप  सी खामोश  सी..
और में भी उसे देखता हूँ दूर से खामोश सा चुपचाप सा..
और सोचता हूँ बस ये पल रूक जाये यहीं कहीं यहीं कहीं...

Sunday, 4 March 2012

मेरे शब्द

मेरे शब्द अब कहीं खो से गए हैं,
शब्दों ने अर्थ लेना भी छोड़ दिया है ,
न वो अब किसी शब्दमाला में जुर रहें हैं न कहीं मिल ही रहे हैं..
संधि और समास का तो कहीं अब नामो निसान न रहा है.. 
अब अर्थ हैं बहुत पर शब्द कहीं गुम से गए हैं..
मंजिल पता है लकिन रास्ते भूल गया हूँ..
सोचता हूँ हर वक़्त की अब सोचना ही छोड़ दूँ..
क्यूँ की अब शब्दों ने साथ देना जो छोड़ दिया है.
लेकिन अब भी दिल में कहीं अक्षर रूप ले रहें हैं शब्दों का 
लेकिन  अर्थ ले नहीं रहें वो शब्द कहीं...
बस तानाबाना सा बुनता रहता हूँ मन में कहीं..
उलझ सा गया हूँ खुद के तानेबाने में  कहीं,...
कोई तो मुझे अब रह दिखाओ ..
मेरी शब्दों को मेरी मंजिल तक पहुँचाओ!
शब्दों को अर्थों मैं पैरों कर मेरी कविताओं  को बस साकार कर जाओ..
एक बार बस मेरी शब्दों में आकर बस जाओ ............



Friday, 2 March 2012

मेरी दादी सबसे प्यारी दादी

मेरी दादी सबसे प्यारी दादी,
हर वक़्त कुछ न कुछ बस करती रहती..
जब भी मैं घर जाता घंटों मुझसे बाते करती,
कुछ पलों में ही में सब कुछ भूल बस उसे सुनता रहता...
जब भी में घर जाता बस वो कहीं न कहीं मेरी राह तकती.. 
हर वक़्त मुझसे पूछती तुन बाहर खुश है तो,
और मैं बस ये सोचता, की दादी न होती तो क्या होगा?
कौन पूछेगा मुझसे मेरी ख़ुशी के बारे में..
आज कुछ ऐसा ही हुआ है वो मुझसे कहीं दूर जा रही है ..
बस टकटकी लगाये देख रही है..
कुछ कहना चाहती  थी मुझसे लकिन कुछ कह भी न कह पा रही थी.. .
शायद अंतिम बार पूछ रही हो मुझसे की तूँ खुश है न?
और मैं बस आँखों में आंशुं लिए  दूर कहीं आ गया हूँ.. 
जहाँ शायद सब खुश हैं लकिन दुसरे के लिए..
अपने लिए तो हर कोई रोता है...
आज मेरी दादी अपनी अंतिम यात्रा पर है 
लेकिन  मैं उससे कुछ नहीं कह सकता...
क्यूंकि मैं दूसरों को खुश करने आ गया हूँ कहीं दूर ...
लकिन जो मुझसे पूछती थी अब वो न पूछेगी कभी
और न मैं बोल पाऊंगा की मैं कुश हूँ भी या नहीं?
अब ये सवाल कहीं अन्दर ही रहेगा मेरे ..
और जब भी घर जाऊंगा याद आएगी मुझे वो, 
लेकिन  अब पूछ न पाएगी कभी वो की तूँ खुश है की नहीं बाहर..
मेरी दादी प्यारी दादी..