दोस्तों की महफ़िल के रंग जमे बड़े दिनों के बाद
हर दोस्त याद आया है अब बड़े दिनों के बाद .....
कुछ के चेहरों को वक़्त ने तो कुछ ने वक़्त को घेर रखा है..
हर कोई है जिम्मेदार कुछ ज्यादा शायद,
जिम्मेदारी से सबका नाता है .....
क्लास मैं टाइम पर आने पर भी पीछे बैठने की जीद होती थी....
तो कहीं दोसरों की कॉपी से उतारने की होड़ होती थी.....
हर बात थी उस वक़्त निराली,
हर मोड़ था निराला......
बिना किसी भेद भाव के दोस्ती थी कहीं.....
जो न दिखती है अब कहीं ...
भेद भी अब हैं वो भी भाव के साथ.....
दोस्ती अब भी है लेकिन हावभाव के साथ....
वक़्त की आंधी मैं खुद को ढाल आये हैं हम ......
अब हमें काम रूपी आंधी हिलाती रहती है हर वक़्त.....
बस जम गए हैं हमारे पांव अपने ही जिमेदारिओं में कहीं.....
चेहरे पर गंभीरता ने ले ली है जगह हर कहीं........
बस दोस्ती रूपी ईमानदारी अभी भी जिन्दा है
हमारे अन्दर कहीं....
और यादें बसी हैं ईमानदारी से हमारे दिलों में कहीं......
जो मिलाती है हमें बस यहीं कहीं यहीं कहीं.........
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