मेरी दादी सबसे प्यारी दादी,
हर वक़्त कुछ न कुछ बस करती रहती..
जब भी मैं घर जाता घंटों मुझसे बाते करती,
कुछ पलों में ही में सब कुछ भूल बस उसे सुनता रहता...
जब भी में घर जाता बस वो कहीं न कहीं मेरी राह तकती..
हर वक़्त मुझसे पूछती तुन बाहर खुश है तो,
और मैं बस ये सोचता, की दादी न होती तो क्या होगा?
कौन पूछेगा मुझसे मेरी ख़ुशी के बारे में..
आज कुछ ऐसा ही हुआ है वो मुझसे कहीं दूर जा रही है ..
बस टकटकी लगाये देख रही है..
कुछ कहना चाहती थी मुझसे लकिन कुछ कह भी न कह पा रही थी.. .
शायद अंतिम बार पूछ रही हो मुझसे की तूँ खुश है न?
और मैं बस आँखों में आंशुं लिए दूर कहीं आ गया हूँ..
जहाँ शायद सब खुश हैं लकिन दुसरे के लिए..
अपने लिए तो हर कोई रोता है...
आज मेरी दादी अपनी अंतिम यात्रा पर है
लेकिन मैं उससे कुछ नहीं कह सकता...
क्यूंकि मैं दूसरों को खुश करने आ गया हूँ कहीं दूर ...
लकिन जो मुझसे पूछती थी अब वो न पूछेगी कभी
और न मैं बोल पाऊंगा की मैं कुश हूँ भी या नहीं?
अब ये सवाल कहीं अन्दर ही रहेगा मेरे ..
और जब भी घर जाऊंगा याद आएगी मुझे वो,
लेकिन अब पूछ न पाएगी कभी वो की तूँ खुश है की नहीं बाहर..
मेरी दादी प्यारी दादी..
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