Monday, 26 March 2012

HAR RANG KUCH KEHTA HAI..

हर रंग कुछ कहता है, ये बचपन से सुनता आया था..
मैंने सोचा क्यूँ ना मैं इन रंगों से ही पूछ लूँ..
मैं ने सबसे पहले लाल रंग को जगाया , 
चुठ्कियुं मैं भर कर पूछा ..
क्या तुन भी कुछ कहता है ...
वो थोडा घबराया फिर होले से मुस्कुराया..
धीरे से मेरी  चुठ्कियुं  वाले रंग को ..
मेरी माशूका के मांग मैं पिरोया  
फिर तन  के बोला कुछ और भी कहूँ...
 या अब किसी और की भी मांग भरून..
मुझे तभी समझ मैं आया दौर कर ब्लू रंग से पूछा..
तुन भी कुछ बता अपने बारे मैं मुझे दिखा..
ब्लू रंग मेरे हाथों  से फिल खुले हवा मैं उड़ चला..
और नीले आसमान का साया मेरे उपर बन पड़ा..
दो रंगों के बाद मैं पहुंचा पीले रंग के पास..
उसने हवाओं के थपेरों  को चूम कर खेतों मैं कहीं लह्लाह्या 
सरसों के फूल मैं खिल जोड़ से मुस्कुराया ..
हस कर बोला मेरी से ही सारी प्रेम कहानी 
बिन मेरे सब ही सादी कहानी..
फिर मुझे याद आया मैंने सादगी वाले रंग सफ़ेद को बुलाया..
वो आया लकिन उस रंग ने मुझे रुलाया..
वो इंसान के कफ़न के रूप मैं आया ..
अंतिम यात्रा के साथी  के रूप मैं मैंने उसे पाया था..
फिर मेरी हिम्मत ना हुई किसी और रंग से कुछ पूछने की..
हर रंगों ने मिल कर पूरी जीवन गाथा लिखी..
हर  रंग ने हमें कहीं न कहीं जीना सिखाया..
हर पल मैं हमें  साथ रहना सिखाया..
सो कर न बैर इन रंगों से मेरे दोस्तों .
इनकों आँखों मैं बासाओ और कर लो इनसे दोस्ती..

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