Friday, 9 March 2012

मेरी माँ

 माँ ममता की तिजोरी है..
हर दुःख में साथ में कहीं खड़ी है..
न कोई उम्मीद मुझसे न कोई तमन्ना है..
बस हर हाल मैं खुश देखना है मुझे.....
बचपन मैं ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया.
हर हिचकियों पर  पीठ भी थपथपाई.
मेरी हर धरकन को खुद मैं समेटा..
और साथ में चलना सिखाया..
जिन्दगी की मझधार में पतवार बनती है माँ..
पूरी उम्र बस आपके लम्बी उम्र की कामना करती है माँ..
आपके आंशुओं को कभी भी देख न पाती है माँ...
बस हर पल आपकी ख़ुशी ....
और बस आपकी ख़ुशी देखना चाहती है माँ..
बचपन में बस्तों का बोझ न पड़े.....
कन्धों पर खुद बैग उताठी है माँ...
हर शाम में अपनी नींद को छोड़...

अपने बच्चों को सुलाती है माँ...
मैंने  कभी भी अपने माँ को सोते हुए नहीं देखा..
न ही कभी बैठे हुए देखा...
हर पल में उसे बस अपनों के लिए जीते देखा है...
पूरी उम्र बस आँखों में रंगीन  सपनों को पलते देखा है..
 लकिन हम अभागे बच्चे उसी माँ को छोड़ कहीं और बसते हैं..
और  माँ के दिल को हर वक़्त दुखाते है...
रुलाते हैं उसे किसी और की ख़ुशी के लिए..
फिर भी माँ न कुछ कहती है....
 हर पल अपने बच्चे की ख़ुशी के लिए जीती है..
जब आँखे भी बंद करती है माँ....
फिर भी एक ही सपना पालती  होगी माँ..
अपनी अंतिम यात्रा पर भी........
अपने बच्चों को बस खुश देखना चाहती है माँ..




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