Sunday, 4 March 2012

मेरे शब्द

मेरे शब्द अब कहीं खो से गए हैं,
शब्दों ने अर्थ लेना भी छोड़ दिया है ,
न वो अब किसी शब्दमाला में जुर रहें हैं न कहीं मिल ही रहे हैं..
संधि और समास का तो कहीं अब नामो निसान न रहा है.. 
अब अर्थ हैं बहुत पर शब्द कहीं गुम से गए हैं..
मंजिल पता है लकिन रास्ते भूल गया हूँ..
सोचता हूँ हर वक़्त की अब सोचना ही छोड़ दूँ..
क्यूँ की अब शब्दों ने साथ देना जो छोड़ दिया है.
लेकिन अब भी दिल में कहीं अक्षर रूप ले रहें हैं शब्दों का 
लेकिन  अर्थ ले नहीं रहें वो शब्द कहीं...
बस तानाबाना सा बुनता रहता हूँ मन में कहीं..
उलझ सा गया हूँ खुद के तानेबाने में  कहीं,...
कोई तो मुझे अब रह दिखाओ ..
मेरी शब्दों को मेरी मंजिल तक पहुँचाओ!
शब्दों को अर्थों मैं पैरों कर मेरी कविताओं  को बस साकार कर जाओ..
एक बार बस मेरी शब्दों में आकर बस जाओ ............



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